Tuesday, February 9, 2016

An End of an Era

The one who wrote the motto for (theoretical) physicists:

कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को खुद नहीं समझे औरों को समझाया है

Kabhi kabhi yun bhi hamne apne jee ko bahlaaya hai
Jin baaton ko khud nahin samjhe auron ko samjhaaya hai

Sometimes even this seems entertaining to me
Explaining to thee, ideas that are unclear to me

–निदा फाज़ली (Nida Fazli)

is no more.

उनकी ही ज़बान से

But then he will always be alive through his Ghazals, Shers, Dohas, Songs and Nazms in his readers’ minds. Let me leave you with some of his creations:

मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में खामोशी पहचाने कौन

तन्हा तन्हा दुःख झेलेंगे महफिल महफिल गाएँगे
जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

दिन सलीके से उगा रात ठिकाने से रही
दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ जमाने से रही

A tribute…

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